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विराट पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि वै स्वय़म् |  ११   क
त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति