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विराट पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुश्च्युतै रुक्मपुङ्खैः शरैः संनतपर्वभिः |  १५   क
द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति