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विराट पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
रणे जित्वा कुरून्सर्वान्वज्रपाणिरिवासुरान् |  १९   क
यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति