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भीष्म पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
केतुमानपि मातङ्गं विचित्रपरमाङ्कुशम् |  ३५   क
आस्थितः समरे राजन्मेघस्थ इव भानुमान् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति