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विराट पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
एते मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः |  ४   क
घोषान्विद्राव्य तरसा गोधनं जह्रुरोजसा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति