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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
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विदुर उवाच
य आत्मनापत्रपते भृशं नरः; स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत |  १०२   क
अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः; स्वतेजसा सूर्य इवावभासते ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति