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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
स गाढविद्धो वलिना भारद्वाजो महाय़शाः |  ४७   क
निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति