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वन पर्व
अध्याय २२८
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धृतराष्ट्र उवाच
उषितो हि महावाहुरिन्द्रलोके धनञ्जय़ः |  १३   क
दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ ततः प्रत्यागतो वनम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति