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द्रोण पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रिय़ाम् |  ९   क
क्लेशांश्च विविधान्कृष्ण सर्वांस्तानपि वेत्थ नः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति