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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
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विदुर उवाच
जानाति विश्वासय़ितुं मनुष्या; न्विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम् |  ८६   क
जानाति मात्रां च तथा क्षमां च; तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति