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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
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विदुर उवाच
अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः; पापैः सन्धिं परदाराभिमर्शम् |  ८९   क
दम्भं स्तैन्यं पैशुनं मद्यपानं; न सेवते यः स सुखी सदैव ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति