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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
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विदुर उवाच
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं; न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यान् |  ९२   क
न मूर्च्छितः कटुकान्याह किं चि; त्प्रिय़ं सदा तं कुरुते जनोऽपि ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति