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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
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विदुर उवाच
दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं; राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम् |  ९६   क
मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं; यः प्रज्ञावान्वर्जय़ेत्स प्रधानः ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति