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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
यस्य ध्वजाग्रे नदतो मृदङ्गौ; नन्दोपनन्दौ मधुरौ युक्तरूपौ |  ६   क
एतं स्वधर्मार्थविनिश्चय़ज्ञं; सदा जनाः कृत्यवन्तोऽनुय़ान्ति ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति