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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं; त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |  १८   क
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता; सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति