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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं; व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |  २४   क
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा; धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति