वन पर्व  अध्याय ८२

पुलस्त्य उवाच

महाश्रमे वसेद्रात्रिं सर्वपापप्रमोचने |  ४८   क
एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् ||  ४८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति