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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |  ५१   क
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति