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कर्ण पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्र वचः शृणु |  ११   क
सदा स्पर्धसि सङ्ग्रामे फल्गुनेन यशस्विना |  ११   ख
तथास्मान्वाधसे नित्यं धार्तराष्ट्रमते स्थितः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति