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कर्ण पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
तदङ्गं पुरुषेन्द्रस्य भ्रष्टवर्म व्यरोचत |  ३०   क
रत्नैरलङ्कृतं दिव्यैर्व्यभ्रं निशि यथा नभः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति