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कर्ण पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
उद्भिन्नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् |  ३४   क
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्रिभिर्विव्याध पाण्डवम् |  ३४   ख
इषुधी चास्य चिच्छेद रथं च तिलशोऽच्छिनत् ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति