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कर्ण पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च |  ४८   क
इति व्रुवाणा अन्योन्यं जघ्नुर्योधा रणाजिरे ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति