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द्रोण पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
वातोद्धूतपताकान्तं रथं जलदनिस्वनम् |  ३३   क
घोरं कपिध्वजं दृष्ट्वा विषण्णा रथिनोऽभवन् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति