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शल्य पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य पुनः पुनः |  १०   क
पश्य युद्धं महावाहो इति ते राममव्रुवन् |  १०   ख
एवमूचुर्महात्मानं रौहिणेय़ं नराधिपाः ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति