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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
पर्वतस्येव शिखरं वज्रपातविदारितम् |  ४१   क
शय़ीत पृथिवीं नूनं शोभय़न्रुधिरोक्षितः |  ४१   ख
मातङ्ग इव मत्तेन मातङ्गेन निपातितः ||  ४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति