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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
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श्रीभगवानु उवाच
कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते |  २४   क
तस्माद्वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापतिः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति