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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
एषा तेऽस्तु मतिर्नित्यं धर्मे ते रमतां मनः |  १६   क
योऽद्य त्वमस्मान्राजेन्द्र श्रेय़सा योजय़िष्यसि ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति