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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
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श्रीभगवानु उवाच
निष्प्रभाणि च तेजांसि व्रह्मा चैवासनाच्च्युतः |  ५४   क
अगाच्छोषं समुद्रश्च हिमवांश्च व्यशीर्यत ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति