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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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जनमेजय़ उवाच
न चास्य किञ्चिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु |  १०   क
त्रैलोक्यनाथो विष्णुः स यस्यासीत्साह्यकृत्सखा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति