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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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जनमेजय़ उवाच
देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत्तस्य दर्शनम् |  १४   क
यद्दृष्टवांस्तदा देवमनिरुद्धतनौ स्थितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति