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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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नारद उवाच
तपसा योज्य सोऽऽत्मानं श्वेतद्वीपात्परं हि यत् |  ४४   क
तेज इत्यभिविख्यातं स्वय़म्भासावभासितम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति