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शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
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वैशम्पाय़न उवाच
एतच्छ्रुत्वा तय़ोर्वाक्यं तपस्युग्रेऽभ्यवर्तत |  २४   क
नारदः प्राञ्जलिर्भूत्वा नाराय़णपराय़णः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति