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शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः |  २   क
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति