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उद्योग पर्व
अध्याय १०७
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सुपर्ण उवाच
एष तस्यापि ते मार्गः परितापस्य गालव |  २१   क
व्रूहि मे यदि गन्तव्यं प्रतीचीं शृणु वा मम ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति