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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्ततां ते महाय़ज्ञो यथा सङ्कल्पितस्त्वय़ा |  १०   क
सङ्कल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति