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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगुणातिगश्चतुष्पञ्चधरः; पूर्तेष्टय़ोश्च फलभागहरः |  १५   क
विदधाति नित्यमजितोऽतिवलो; गतिमात्मगां सुकृतिनामृषिणाम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति