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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रोष्य वर्षसहस्रं तु नरनाराय़णाश्रमे |  २   क
श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् |  २   ख
हिमवन्तं जगामाशु यत्रास्य स्वक आश्रमः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति