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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
तावपि ख्याततपसौ नरनाराय़णावृषी |  ३   क
तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति