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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नाम भवेद्द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् |  ७   क
आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेय़ो विष्णुरिति स्थितिः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति