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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नं व्यासं विद्धि नाराय़णं प्रभुम् |  ९   क
को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद्भवेत् |  ९   ख
धर्मान्नानाविधांश्चैव को व्रूय़ात्तमृते प्रभुम् ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति