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शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
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जनमेजय़ उवाच
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः |  २   क
स तथा नः श्रुतो व्रह्मन्कथ्यमानस्त्वय़ानघ ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति