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शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
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जनमेजय़ उवाच
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा |  ४   क
रूपं प्रभावमहतामपूर्वं धीमतां वर ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति