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शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
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व्यास उवाच
तत उत्तममास्थाय़ वेगं वलवतां वरौ |  ५६   क
पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालय़ात्तदा |  ५६   ख
ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति