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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं मय़ाभ्यनुज्ञातस्त्वय़ा च पृथिवीपते |  ११   क
करोतु स्वमभिप्राय़ं मास्य विघ्नकरो भव ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति