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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
त्रिवर्गो यस्य विदितः प्राग्ज्योतिः स विमुच्यते |  ५५   क
अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति