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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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जनमेजय़ उवाच
ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः |  २   क
तेषां त्वय़ाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यागता गतिः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति