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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुना द्विपदां श्रेष्ठ प्रथितो जगदाय़ुषा |  २१   क
वाय़ोः सकाशात्प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति