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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
जगत्स्रष्टुमना देवो हरिर्नाराय़णः स्वय़म् |  २४   क
चिन्तय़ामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति