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शान्ति पर्व
अध्याय २९९
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याज्ञवल्क्य उवाच
चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा |  १६   क
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति |  १६   ख
तथेन्द्रिय़ाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति