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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा |  ५४   क
जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति